Wednesday, October 28, 2015

जी नहीं लगता.......


कई बार चाहा कह दूं
जी नहीं लगता आपके बि‍न
मगर हर बार कहने से पहले
जुबां कांपती है
अतीत से नि‍कलकर एक काली याद
आंखों पर छाती है
शब्‍द खामोश हो जाते हैं
 
सारी कोमल भावनाओं को
तब वापस
अपने अंदर गटक लेती हूं
देखती हूं तुम्‍हारी ओर
प्रेम के सैलाब की झीनी सी
उम्‍मीद लि‍ए
जो मुझे संग अपने बहा ले जाए

अपने स्‍नि‍ग्‍ध स्‍नेह से
अतीत की परछाईं मि‍टा दे
ताकि‍ फि‍र मैं कह पाऊं
हां..मैं जी नहीं सकती आपने बि‍न

मगर पाती हूं
तुम्‍हारे अंदर वो ही
चि‍र खामोशी व्‍याप्‍त है
हि‍म से शीतल अहसास हैं
और दोराहे पर उलझे से खड़े हो
मेरी पहल की राह देखते से
जैसे, मेरे कदमों की दि‍शा देख
अपनी मंजि‍ल का ढूंढोगे रास्‍ता

कि‍तनी बार बताया है
जमाने ने भी समझाया है
लेकर नहीं दि‍या जाता है प्‍यार
मगर तुमने शायद
प्‍यार को यूं ही समझा है

देखो, मैं अब भी अपने अंदर उमड़ते
जज्‍बातों को
ज़बरन खामोश कर रही हूं
जो कह रहा चीख-चीखकर मुझसे
जी नहीं लगता उनके बि‍न
एक बार कह तो दो दि‍ल की बात...........। 

7 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2144 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2144 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Kavita Rawat said...

जो मन में बस जाते हैं
वे लाख करो नहीं भुलाये जाते है
रह रह कर याद आते हैं ...
...प्यार की आकुलता व्याकुलता झलकते देर नहीं लगती

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.10.2015) को "आलस्य और सफलता "(चर्चा अंक-2145) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

Pallavi saxena said...

बहुत उम्दा।

रश्मि शर्मा said...

Dhnyawad

रश्मि शर्मा said...

Aapka bahut-bahut dhnyawad aur aabhar