Tuesday, March 28, 2017

पलामू कि‍ले का भग्‍नावशेष


रांची से हमलोग 24 मार्च को मेदि‍नीनगर गए थे एक कार्यक्रम में भाग लेने के लि‍ए। सुबह जब वापसी होने लगी  25 को तो दस बज गए थे। धूप तेज थी मगर सोचा कि‍ राजा मेदि‍नी का कि‍ला देख ही लि‍या जाए। पूरे रास्‍ते पलाश के जंगल की खूबसूरती देख मंत्रमुग्‍ध होते आए थे। जंगल दहक रहा हो जैसे।  सुना था पलामू के कि‍ले के लि‍ए कि‍ अब खंडहर ही बच गया है। तय हुआ मीनारें न सही दीवारें तो कुछ बयां करेंगी।

बेतला जाने के रास्‍ते में है पलामू कि‍ला। मेदि‍नीनगर से दस कि‍लोमीटर की दूरी पर बेतला जाने के रास्‍ते में । यानी डाल्‍टनगंज से 20 मील दक्षि‍ण-पूर्व पर स्‍थि‍त है। कच्‍चे रास्‍ते पर हि‍चकोले खाते हम चल दि‍ए। रास्‍ता बन रहा है अभी। शायद कुछ दि‍नों बाद काेलतार की सड़क मि‍ले हमें वहां।



बता दें कि‍ पलामू के राजा मेदि‍नी राय जनता के प्रि‍य राजा थे। उन्‍हीं के नाम पर जनता की पुरजोर मांग के बाद डाल्‍टेनगंज का नाम बदलकर मेदि‍नीनगर कि‍या गया है। कर्नल डाल्‍टन जो ब्रि‍टि‍श राज्‍य में छोटानागपुर के पहले कमि‍श्‍नर थे, उन्‍हीं के नाम पर यहां का नाम डाल्‍टनगंज पड़ा। उस वक्‍त डाल्‍टेनगंज 'बि‍जरा' बाग के नाम से प्रसि‍द्ध् थ्‍ाा। ऊंची पहाड़ि‍यों के बीच पलामू कि‍ला औरंगा नदी के कि‍नारे बसा है। मगर अफसोस कि‍ हमें औरंगा नदी मार्च के महीने में भी सूखा मि‍ला। अनुमान लग गया कि‍ गर्मी में कि‍तनी त्राहि‍ मचती होगी यहां।


रास्‍ते में हमें दूर ऊंची पहाड़ी पर एक कि‍ला नजर आया। रास्‍ता समझ नहीं आ रहा था। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर एक वि‍शाल कि‍ले का बाहरी हि‍स्‍सा दि‍खा । सब तरफ झाड-झंखाड़ उग आए हैं। बहुत हद तक दीवारें ढकी हुई हैं इनसे। मगर खंडहर देख कर भी कभी कि‍तना जीवंत रहा होगा इसका अहसास होता है। 400 वर्ष पुरानी वि‍रासत है पलामू की। उपेक्षि‍त मगर दर्शनीय। अगर अन्‍य राज्‍यों की तरह इस वि‍रासत की साज-संभाल हो तो हम अपने अतीत को संजो पाएंगे। पलामू के प्रसि‍द्ध चेरो राजा मेदि‍नी राय ने इस कि‍ले का नि‍र्माण कराया था। अंदर की तरफ एक कुआं हुआ करता था, ये सुना था मगर अब वो भर गया है। कि‍ले की बनावट भव्‍य और नक्‍काशीदार है। नि‍र्माण कला मुगलकालीन लगती है। जगह-जगह गुंबद भी बनाए गए हैं। दूर कई कमरे नजर आ रहे थे। अनुमान है कि‍ यह सैनि‍कों का नि‍वास स्‍थान होगा। मगर यह कि‍ला अधूरा बना हुआ है।



कि‍ले के मुख्‍य द्वार के सामने कुछ अवशेष थे जो हमें आभास देते थे कि‍ यह सुरंग रहा होगा। भग्‍न ऊंची दीवारें और ऊपर मीनारें। जरा अंदर जाने पर वि‍शाल दरवाजा जो अपनी भव्‍यता आ आभास दे रहा था हमें। प्रधान फाटक नागपुरी फाटक के नाम से जाना जाता है। अंदर उग आए झाड़ और पेड़ों के बीच वाच टावर जैसी मीनार मि‍ली।पूरा कि‍ला पत्‍थर और कंक्रीट से बना लगा।  टूट-फूट के बावजूद देखने लायक जगह लगी हमें। हम जि‍स कि‍ले में थे वो नया कि‍ला था। पुराना कि‍ला पहाड़ी पर था, वहां जाना संभव नहीं था हमारे लि‍ए। कुछ वक्‍त की कमी और कोई बताने के लि‍ए भी नहीं था। बहुत सुनसान क्षेत्र । लगा कि‍सी जानकार को लेकर आना चाहि‍ए था।





हमें और अंदर तक जाने का मन था। दूर कि‍ला दि‍ख रहा था मगर रास्‍ता नहीं समझ आया। पता लगा कि‍ ऊपर से ऊपर औरंगा नदी तक जाने के लि‍ए एक अधूरा पुल है वहां। इति‍हास से पता चलता है कि‍ले के नि‍र्माण के समय ही राजा मेदि‍नी की मृत्‍यु हो गई, इसलि‍ए यह अधूरा ही रहा। अगर अधूरा कि‍ला का अवषेश इतना भव्‍य है तो पूरा बनने के बाद क्‍या होता।  हम मन में इस कचोट को साथ लि‍ए बाहर आए कि‍ काश, इसका जीर्णोधार हो पाता। हम पुराने कि‍ले तक जा पाते तो कि‍तना अच्‍छा होता। पलामू कि‍ला एेति‍हासि‍क है और इससे पहले कि‍ पूरी तरह ढह जाए, इस वि‍रासत की साज संभाल कर लेनी चाहि‍ए।


Monday, March 20, 2017

साथी थी गौरैया...


कभी आँगन में फ़ुदकती
कभी
खाट के पायों पर आकर
बैठती थी गौरैया

धान के बोरे में चोंच घुसाने को
दरवाजे की फांक से अन्दर
फ़ुदक कर
अक्सर आ जाती थी गौरैया

नहीं डरती थी वो ज़रा भी
बिल्कुल पास चली आती थी
इधऱ-उधर बिखरे दानों को चुग
चीं-चीं कर उड़ जाती थी गौरैया

छत पर सूखने को माँ रखती थी
भर- भर सूप चावल
छतरी की तरह ढांप कर
ढेरों चावल खा जाती थी गौरैया

जब कभी बरखा में भीग
आती थी, देखकर भी मुझको
बड़े आराम से फ़ड़फ़ड़ा कर पंख
ख़ुद को सूखती थी गौरैया

हाँ, मेरे बचपन की
साथी थी गौरैया
कभी मेरे घर आँगन में
खूब आती थी गौरैया

Saturday, March 18, 2017

दौड़ती-भागती जि‍ंदगी


पढ़ी हुई क़ि‍ताब का
तुम वो सफ़ा हो
जो बेहद पसंद है मुझे
मगर मैं बार-बार पढ़ना नहीं चाहती
इसलि‍ए बंद रखती हूं
यादों की वो कि‍ताब
जि‍ससे तुम्‍हारी रुपहली मुस्‍कान
झांका करती है गाहे-बगाहे
और तुम
अरसे बाद बीच-बीच में
बाहें पसारे चले आते हो
जैसे मेरी खाति‍र
वक्‍त को थाम रखा है
जि‍ंदगी दौड़ती-भागती फि‍र रही है
कुछ लम्‍हों को
ऐसी शाख पर रख छोड़ा है
जो पतझड़ में भी मुरझाती नहीं....। 

Friday, March 17, 2017

शांत खामोश शाम...


मन खाली है
उदास नहीं
मेरे आसपास पसरी है
कॉफी की गंध
इसके सहारे दूर करना चाहती हूं नीरसता
न खोया है कुछ न पाया है
बस एक शांत खामोश शाम है यह
कॉफी की खुश्‍बू और कोयल की अनवरत
कूहु के अलावा
कुछ भी नहीं पास है
और सबसे अजीब बात
कि‍ कि‍सी चीज की चाह नहीं.....। 

Sunday, March 12, 2017

लालसा की होलिका में....


प्रह्रलाद की तरह
आज
हर इंसान जल रहा है
माया-मोह-लालसा
की होलिका में...
इन्‍हें कि‍सी
हि‍रणकश्‍यप ने
अपने अंहकार के वशीभूत हो
आग में
जलने को वि‍वश
नहीं कि‍या है....
आज के इंसान को
मुक्‍ति‍ नहीं
भोग की 
है कामना 
इसलि‍ए तो लोग
अपने हाथों
लालच की होलि‍का
बनाते हैं
और खुशी-खुशी
जल जाते हैं.....। 

फगुआये गई होरी .....


रक्ताभ कपोल पर
लाल गुलाल
लजाय गई गोरी ।
भीगी चुनरिया
दहका अंचरा
बौराये गई होरी ।

चंदन सा महका
तन भीग भीग बहका
छेड़ती हवाओं से
फगुआये गई होरी ।

रंगों के बहाने है
अंग सब भिगाने हैं
कवन रंगरेज से
रंगाये गई होरी ।

बेसुध बोली बोल के
आगे पीछे डोल के
पिचकारी भर उबै श्याम
ललचाये गई होरी ।

बंसुरिया की तान जी
छेड़ दिए कान जी
बरसाने से निकसी राधे
बुलाये गई होरी ।

बृज की छोरियन को
वृन्दावन की गोरियन को
भँग की ठण्डाई दे
नचाये गई होरी ।

Wednesday, March 8, 2017

''अंतरराष्‍ट्रीय महि‍ला दि‍वस की शुभकामनाएं''

"नारी अग्नि है, तू अवनि है , तू ही आकाश है
ऊष्मा तुझमें, ऊर्जा तुझमें, तू बड़ी ही ख़ास है"


Friday, March 3, 2017

सूनी सी है दोपहर


शांत..सूनी सी है दोपहर 
उजली-चमकती धूप बैठी है पीपल के पत्‍तों पर...न ढलती है शाम
न बीतता है वक्‍त...
लगातार बज रही एक धुन है.... उदासी का राग जाने कौन अलाप रहा है.....

मन भागना चाहता है अतीत की ओर.....और मैं गुजरे वक्‍त की रस्‍सी को जल्‍दी से समेट कर आगे देखना चाहती हूं....
कि जिंदगी इतनी भी बुरी नहीं....ऐसा नहीं कि तुम नहीं तो दुनि‍या नहीं...

फागुन फि‍र से आया है .......रंग अब भी चमकीले हैं पहले की तरह 

तस्‍वीर- रामगढ़ घाटी में थी थी एक दि‍न 

Wednesday, March 1, 2017

सि‍जलि‍ंग ट्री


फि‍र तुमने याद दि‍ला दि‍या वो वक्‍त। पहाड़ से साए में बसा घर जहां धूप और बारि‍श के मेले में चटखती थी बंद कलि‍यां। हवा का हमसे याराना देख पत्‍ति‍यां कसमसा उठती थी दामन को छूकर फना होने को ।

पहाड़ों की अाग को आंखों में भरा था ....बादलों के आगोश में आस्‍मां तक सीढ़ी लगाने की ख्‍वाहि‍श को पीपल के पत्‍ते ने हवा दी थी।

पीछे पहाड़ पर खि‍ला करते थे शि‍रीष के सफ़ेद-पीले फूल और पुटूस के रंगों से फूलों की घाटी सी लगती थी वो वादि‍यां। शाम उतरती थी नारंगी रंग लि‍ए और दोपहर का एकांत पीपल-शि‍रीष के तले सरसराहट से भर उठता था। पीपल के बीजों की 'चकरी' और मंदि‍र का एकांत।

तुम्‍हें बहुत पसंद है न मेरा गांव। उस नीरव एकांत में एकटक तकते रहना कि‍तना पसंदीदा काम का तुम्‍हारा। पहाड़...पेड़ और एक चेहरा।
 उस दि‍न जेठ की दुपहरी सी ही तो थी दोपहर जब नीले गुलमोहर को मेरी ही गली से समेटकर हाथों में भरे अचानक से चौंका गए थे मेरे ऊपर फेंककर।

डर से कांपना मेरा और  शि‍रीष की सूखी फलि‍यों की खड़खड़ाहट एक सी लगी तुमको..... ''सि‍जलि‍ंग ट्री''...बोलो कौन.....

मैं...ना..ना....वो लाल फूलों वाला शि‍रीष। मेरी फ्रॉक भी तो लाल ही थी।

अच्‍छा लगा कि‍ तुम्‍हें याद है अब भी सब.... पीपल की चकरी नहीं चुनती अब मैं...दोपहर बोलती है कानों में आकर.....सि‍जलि‍ंग ट्री.....सि‍जलि‍ंग ट्री।

Tuesday, February 28, 2017

पलाश


सारे जंगल में खि‍ला है पलाश
ये स्‍मरण है तुम्‍हारा ही
बैंजनी आकाश, और
सूखे पत्‍तों में गि‍रा, दहकता पलाश