Saturday, June 24, 2017

न नि‍काले कोई....


"ये ज़हर मेरे लहू में उतर गया कैसे".....रात भर गूंजती रही कमरे में मेहदी हसन की दर्द भरी आवाज.....
ऐसा ही होता है जब प्रेम और प्रेम से उपजा दर्द तराज़ू के दो पलड़ों में बराबर तुलता है। वक़्त ठहरा होता है। साल की सबसे छोटी रात सबसे लंबी कब हो जाती है .....यह दर्द के लहरों पर सवार उस प्रेमी से पूछिये जिसके हिस्से केवल फ़रेब आया हो।
मगर जब कोई खुद को किसी गहरी आवाज के साये में दर्द भरे शब्दों के बीच छोड़ देता है ....तो यह मान लेना चहिये कि अब दर्द पीना आ गया उसे। न देता हो तो न दे कोई हाथ....न निकाले कोई उसे फिर से छोड़ जाने को।
कितना मज़ा है ग़म में कि मदिरा की घूँट पहली बार हलक से उतरे ....आह....जलन का अपना मज़ा है।
ओ जालिम....तुम्हें नहीं पता....खुद को खुद ही सँभालने से अच्छी कोई शै नहीं होती इस दुनियां में .....जाओ कि दर्द से उफ़ नहीं करता कोई.... फिर गूंजने लगी वो ही आवाज..... मैं होश में था.....


Sunday, June 18, 2017

पि‍ता


लोरि‍यों में कभी नहीं होते पि‍ता
पि‍ता होते हैं
अाधी रात को नींद में डूबे बच्‍चों के
सर पर मीठी थपकि‍यों में

कौर-कौर भोजन में
नहीं होता पि‍‍‍‍ता के हाथों का स्‍वाद
पि‍ता जुटे होते हैं
थाली के व्‍यंजनों की जुगाड़ में

पि‍ता कि‍स्‍से नहीं सुनाते
मगर ताड़ लेते हैं
कि‍स ओर चल पड़े हमारे कदम
रोक देते हैं रास्‍ता  चट्टान की तरह

पि‍ता होते हैं मेघ गर्जन जैसे
लगते हैं तानाश्‍ाााह
दरअसल होते हैं वटवृक्ष
बाजुओं में समेटे पूरा परि‍वार

जीवन में आने वाली कठि‍नाइयों को
साफ करते हैं पि‍ता
सारी नादानि‍यों को माफ़ करते
आसमान बन जाते हैं पि‍ता

जीवन भर छद्म आवरण ओढे़
नारि‍यल से कठोर होते हैं पि‍ता
एक बूंद आंसू भी
कभी नहीं देख पाता कोई

मगर बेटी की वि‍दाई के वक्‍त
उसे बाहों में भर
कतरा-कतरा  पि‍‍‍‍घल जाते हैं पि‍ता
फूट-फूट कर रोते हुए
आंखों से समंदर बहा देते हैं पि‍‍‍‍ता

Tuesday, June 6, 2017

नेतरहाट : खूबसूरती सुबह और शाम की




अब शाम का रंग बदलने लगा थ्‍ाा। सूरज के आसपास नारंगी रंग फैला था। एक के बाद एक पहाड़ दूर तक नजर आ रहे थे। लोगों का ध्‍यान सब तरफ से हटकर सूरज की ओर था। आसमान साफ था, सो हम आराम से देख पा रहे थे कि‍ कैसे सूरज के आसपास लालि‍मा बढ़ती जा रही है और गहरे होते आसमान में सूरज कि‍तना खूबसूरत लगने लगा।

धीरे-धीरे सूरज डूब गया। अब हल्‍का उजाला था। लोग वापस  जाने लगे। पर अब हम वहां आराम से बैठे थे। चाय के साथ आलू की पकौड़ी बनावाई क्‍योंकि‍ दुकान में प्‍याज खत्‍म हो गया था। आसपास एक दो घर थे। कुछ गांववाले बैठे थे। पर्यटक सारे जा चुके थे।


आसमान में चांद चमक रहा था। सखुआ के फूल चुनने लगे हमलोग। वादि‍यां और मनमोहक लगने लगी। शांत वातावरण में ऐसा लगा जैसे कोई बासुंरी बजा रहा हो। जरूर वो चरवाहा मधुर बांसुरी बजाता होगा जि‍सके आकर्षण में बंधकर मैग्‍नोलि‍या को प्‍यार हो गया होगा उससे। अद्भुत है जगह..जहां एक प्रेम कहानी जि‍ंदा है। वहां चरवाहे और मैग्‍नोलि‍या के प्रेम की तस्‍वीरें उकेरी हुई हैं। उस घोड़े की भी प्रति‍मा है जि‍सके साथ वो लड़की कूद गई थी घाटि‍यों में।  अब हमें जाना था। एक प्रेम कहानी को मन में गुनते हुए वहां से वापस आए।


वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में ठहरना था हमें। हम सब नि‍कल पड़े। रास्‍ते में प्रसि‍द्ध नेतरहाट वि‍द्यालय मि‍ला। कुछ देर वहां रूककर देखा हमने। कैंपस के अंदर नहीं गए क्‍योंकि‍ शाम ढल गई थी। नेतरहाट वि‍द्यालय की स्‍थापना 15 नवंबर1954 में हुई थी। 24 जुलाई 1953 को इस वि‍द्यालय की स्‍थापना का निर्णय लि‍या गया था। इसका श्रेय जाता है सर पि‍यर्स को, जि‍नके प्रयास से एक ऐसे आवासीय वि‍द्यालय की स्‍थापना हुई, जि‍सके छात्रों ने अनेकानेक क्षेत्रों में अपने नाम की कीर्ति फैलाई ।  भारतीय शि‍क्षा जगत में सर पि‍यर्स का अतुलनीय योगदान है। जाति‍ से अंग्रेज होने पर भी उन्‍होंने भारत को अपनी कर्मभूमि‍ मान लि‍या था। नेतरहाट का चयन इसलि‍ए कि‍या गया क्‍योंकि‍ ग्रामीण परि‍वेश और वहां की जलवायु उत्‍तम थी। 

 दरअसल इस तरह के आवासीय वि‍द्यालय की मांग तत्‍कालीन बि‍हार के धनी वर्ग की थी, जो अपने बच्‍चों को सि‍ंधि‍या, दून आदि‍ दूर के स्‍कूलों में भेजने के बजाय पास ही कोई वैसा स्‍कूल चाहते थे, जि‍समें वैसी सुवि‍धाएं हों।  वि‍द्यालय में शि‍क्षा का माध्‍यम हि‍ंदी है और नामांकन परीक्षा के आधार पर होता है। हालांकि‍ अब पहले सी उज्‍जवल छवि‍ नहीं, कई और स्‍कूलों का परीक्षाफल भी अच्‍छा होने लगा है पर एक वक्‍त था जब इसी वि‍द्यालय का डंका बजता था।

 इस सुरम्‍य स्‍थल को सामने लाने का श्रेय सर एडवर्ट गेट तत्‍कालीन लेफ्टि‍नेंट बंगाल, बि‍हार एवं उड़ीसा को  जाता है। उन्‍हें यहां की प्रकृति‍क सुंदरता से प्रेम था। उन्‍होंने ही अपने आवास राजभवन शैले हाउस का नि‍र्माण के  साथ-साथ अन्‍य बुनि‍यादी संरचनाएं भी स्‍थापि‍त की। शैले लकड़ी की एक भव्‍य इमारत है। नेतरहाट वि‍द्यालय  के प्रथम सत्र के छात्र इसी इमारत में पढना शुरू कि‍ए थे।

अब हम अपने पड़ाव की ओर अग्रसर थे। वन वि‍भाग के रेस्‍ट हाउस में जाकर आराम करना था। बहुत मोहक और खूबसूरत बना हुआ है रेस्‍ट हाउस। शाम की दूसरी चाय यहीं पी हमने और ढेर सारी बातें भी की। बच्‍चे बैडमि‍ंटन खेलने में लग गए।  कुछ देर बाद जब चांदनी रात में टहलने नि‍कले तो चीड़ के दरख्‍त और यूकोलि‍प्‍टस की गगन छूते पेड़ देखकर हमें रोमांच हो आया। रातरानी की खूश्‍बू से परि‍सर महक रहा था।


मगर यहां नेटवर्क की समस्‍या थी। न रि‍लाइंस का फोन कार्य कर रहा था न जि‍यो न वोडाफोन। बस ऐयरटेल का एक नंबर चालू था। दूसरी दि‍क्‍कत यह कि‍ बहुत छोटी जगह है। खाने-पीने के सामान मि‍लने में भी परेशानी होती है। स्‍थानीय बाजार साप्‍ताहि‍क है, इसलि‍ए सब्‍ि‍जयों की भी आमद कम है। होटल भी कम ही हैं और ऐसे दुकान भी जहां से सामान लि‍या जा सके। हालांकि‍ कुछ घर ऐसे नजर आए हमें जि‍से देखकर लगा कि‍ उनलाेगों ने अपने घर को गेस्‍ट हाउस में तब्‍दील कर दि‍या है। यह देखकर वाकई बहुत दुख होता है कि‍ इतनी खूबसूरत जगह को सरकार तरीके से डेवलप करे तो कि‍तने लोग आएंगे यहां। नेतरहाट को यूं ही 'छोटानागपुर की रानी' नहीं कहा जाता। वाकई बहुत खूबसूरत वादि‍यां हैं मगर उपेक्षा की शि‍कार।


हमारा खाना यहीं रेस्‍ट हाउस में बना। कुछ लोग जगह की तलाश में आए वहां मगर बि‍ना बुकि‍ंग के संभव नहीं था ठहरना। खाने के बाद सबलोग एक बार फि‍र टहलने नि‍कले। गर्मी कम थी। रांची का मौसम तो अब बहुत बदल गया है। बि‍ना एसी के काम नहीं चलता। मगर बाहर तो ठंढी हवा थी और रात कमरे में एक पंखे से काम चल गया। हमें सूर्योदय के लि‍ए सुबह उठना था मगर सोने को कोई तैयार ही नहीं था। मुश्‍कि‍ल से दो-तीन घंटे की नींद ले पाए। सुबह चार बजे सारे लाेग उठकर तैयार।


सूर्योदय के लि‍ए पता लगा कि‍ राज्‍य पर्यटन वि‍भाग का होटल है प्रभात वि‍हार होटल, वहीं जाना होगा। हम सब तुरंत वहां के लि‍ए नि‍कले। पहंचे तो पता लगा कि‍ होटल और आसपास बन रहे बि‍ल्‍ड़ि‍ग के ऊपर चढ़कर लोग देखते हैं सूरज का नि‍कलना। हमें लगा इससे कही बेहतर है अपने रेस्‍ट हाउस के उस प्‍वाइंट से देखना जो खास इसके लि‍ए बनाया गया है। वहां के कर्मचारी ने कहा भी था कि‍ यहां से बहुत अच्‍छा दि‍खता है, आप देख सकते हैं।
अब वापस रेस्‍ट हाउस। उजाला फैलना शुरू ही हुआ था। सूरज नि‍कलने में देर थी। बच्‍चे आनंद लेने लगे। सामने घना जंगल। परतों में पहाड़ दि‍ख रहा था। आसपास चीड़ के पेड़ थे। गुलमोहर के फूल जमीन पर गि‍रे थे। बच्‍चे चीड़ के फल जमा करने लगे तो कभी ट्री हाउस पर चढ़कर सूरज को आवाज लगाने लगे। पूरब की तरफ पहाड़ों के ऊपर, चीड़ की पत्‍ति‍यों के पीछे से सूरज नि‍कलने लगा। हल्‍की धूंध के पीछे से नि‍कलता सूरज सबको रोमांचि‍त कर रहा था। वैसे भी शहराें में लोग कहां देख पाते हैं सूर्योदय। सूरज की पहली कि‍रण का स्‍पर्श कि‍तना सुखकर हो सकता है..यह देर से बि‍स्‍तर छोड़ने वालों को क्‍या पता।


कुछ देर बात सूर्य की रश्‍मि‍यां फैल गईं सब ओर। हम भी बि‍खर गए अपने अपने पसंद की जगह देखने के लि‍ए। फोटोग्राफी के लि‍ए सबसे अच्‍छा समय होता है।

 मैं कैमरा थामे नि‍कल गई वहीं। देखा दूर जंगल में लोग पानी की बोतल थामे चले जा रहे है। अब लोटे का रि‍वाज खत्‍म हुआ न.....सरकार का नारा अभी हर जगह स्‍वीकार्य नहीं। शायद वो सोच नहीं सो शौचालय भी नहीं। अब नजरें घुमाकर देखा। फूलों का रंग और चटख था। यूकोलि‍प्‍टस के सफेद , चि‍कने तने और गगनचुंबी डालि‍यों ने हैरत में डाला हमें। बेगनबोलि‍या की सफेद, गुलाबी फूल मन मोह रहे थे तो तरह-तरह के फूलों से जमीन पटी हुई थी। पेड़ से गि‍रे भूरे पत्‍ते और पेड़ों पर लगे हरे पत्‍ते मि‍लकर अद्भुत दृश्‍य बना रहे थे। हमने खूब तस्‍वीरें ली।


अब सूरज की गर्मी महसूस होने लगी। हमें वापस जाना था आज ही क्‍योंकि‍ अचानक प्‍लान बना कर आए थे। गर्मी देखकर ये लगा कि‍ दि‍न में कहीं घूमना संभव नहीं होगा। इसलि‍ए बेहतर है एक बार और घूमने के लि‍ए जाड़ों में आए जाए। यहां आसपास कई फॉल है। ऊपरी घाघरा झरना नेतरहाट से चार कि‍लोमीटर की दूरी पर है और नि‍चली घाघरा झरना 10 कि‍लोमीटर की दूरी पर। हालांकि‍ पता चला कि‍ गर्मी के कारण पानी कम है अभी इसलि‍ए जाने का कोई फायदा नहीं।


हमारा मन लोध झरना जाने का जरूर था। इसे झारखंड का सबसे ऊंचा झरना माना जाता है। कहते हैं कि‍ झरने के गि‍रने की आवाज आस-पास 10 कि‍लोमीटर तक सुनाई पड़ता है। यह नेतरहाट से 60 कि‍लोमीटर की दूरी पर बुरहा नदी के पास है।  मगर सभी लोग जाने के लि‍ए तैयार नहीं हुए। सुबह के चार बजे उठने की आदत नहीं कि‍सी की सो सब अलसाए लगे। हमने तय कि‍या कि‍ कुछ दि‍नों बाद फि‍र आएंगे यहां।


अब हमने सामान समेटा और नि‍कल गए। थोड़ी दूर पर नाशपती का बगान मि‍ला। फल लदे थे मगर कच्‍चे थे अभी। अब वापसी में वही सब नजारा। घने दरख्‍त, कोईनार या कचनार के पेड़..चीड़ के ऊंचे पेड़ और बांस के घने जंगल से आती सरसराहट की आवाज। रास्‍ते में नदी मि‍ली जि‍सका पानी कम था।



हां, इस वक्‍त आम के पेड़ के नीचे बच्‍चे कम थ मगर सड़कों पर लकड़ी ले जाते कई लोग मि‍ले। खासकर औरतें। सड़क पर जगह-जगह कुछ सूखने के लि‍ए डाला हुआ था। देखा..ये कटहट के बीज थे। जब कटहल पक जाते हैं तो उनके बीज नि‍कालकर सब्‍जी बनाई जाती है।
मैंने अक्‍सर देखा है गांव में पक्‍की सड़क पर कभी धान सूखने डाला होता है तो कभी महुआ। आज कटहल के बीज देखे वो भी बहुत सारे। धूप सर पर थी। सड़कों में सन्‍नाटा। बच्‍चे सो गए थे सारे। हमें भी नींद आ रही थी। लगभग चार घंटे का सफ़र था और उसके बाद हम अपने घर में। जल्‍दी ही दोबारा आने के वादे के साथ।





Sunday, June 4, 2017

नेतरहाट - बांस के जंगल या चीड़ वन



बचपन से सुना है नेतरहाट के बारे में। एक तो वहां का सूर्योदय और सूर्यास्‍त, दूसरा नेतरहाट वि‍द्यालय, जो अपने शि‍क्षा के कारण बेहद प्रसि‍द्ध है। बि‍हार बोर्ड की परीक्षाओं में माना जाता था कि‍ प्रथम दस तक का स्‍थान नेतरहाट आवासीय वि‍द्यालय के बच्‍चे ही प्राप्‍त करते थे।

यह संयोग ही रहा कि‍ देश के अनेक जगहों में जाना हुआ मगर अपने ही झारखंड के इस सुरम्‍य वादि‍यों में जा नहीं पाई। शायद मन में यह भाव रहा हो कि‍ यह तो अपने घर के पास ही है। जब चाहे जाया जा सकता है। हुआ भी ऐसा ही। आनन-फानन में नेतरहाट जाने की योजना बनी और 2 घंटे के अंदर परि‍वार के कुछ लोगों के साथ नि‍कल पड़ी।

रांची से नेतरहाट की दूरी करीब 155 कि‍लोमीटर है। यह क्षेत्र लातेहार जि‍ले में पड़ता है। कुड़ू के बाद लोहरदगा, फि‍र घाघरा से दाहि‍नी ओर मुड़ना पड़ा नेतरहाट के लि‍ए। रास्‍ता अच्‍छा और जाना पहचाना था, सो आराम से चल दि‍ए हम। घर से नि‍कलते ही दोपहर हो गई थी। समय बचाने के लि‍ए खाना घर ही से पैक कर लि‍ए और चल पड़े। लोहरदगा के पहले एक जगह रास्‍ते में रूककर हमलोगों ने भोजन कि‍या और आगे नि‍कले।

गर्मी का दि‍न.. दोपहर की धूप मगर पूरे रास्‍ते हरि‍याली। आम से लदे पेड़ और नीचे बच्‍चों का जमावड़ा। कोई पत्‍थर चला कर आम तोड़ रहा है तो कोई गुलेल से नि‍शाना साध पके आम जमीन पर गि‍रा रहा है। लड़कि‍यां भी कम नहीं थी। खूब ढेला चलाती दि‍खीं। कुछ बच्‍चि‍यों ने अपने फ्राक में आम समेट रखा था और कुछ तुरंत गि‍रे आमों का स्‍वाद ले रहे थे।


सच कहूं..तो अपना बचपन याद आ गया। आम चुनने के चक्‍कर में कभी गर्मी का अहसास हुआ ही नहीं। सारी दोपहर आम के बगीचे में बीतता था। पूरे रास्‍ते इन पेड़ों और बच्‍चों को देखकर अहसास हुआ कि‍ वाकई फलदार पेड़ लगाना परोपकार का कार्य है। मेरे जैसा कोई भी पथि‍क अपनी इच्‍छा पूरी कर सकता है अपने ही हाथों आम ताेड़ कर खाने की।

खैर ..इन्‍हीं नजारों के बीच झारखंड के सुंदर गांवों को पार करते हम पहुंचे बनारी गांव। इसके बाद सड़क ऊपर की तरफ जाने लगी। गोल-गोल चक्‍कर खाती सड़कें। ऐसा लगा कि‍ हम कि‍सी पहाड़ पर चढ़ रहे। पि‍छले वर्ष डलहौजी गए तो ऐसा ही लगा था बि‍ल्‍कूुल। नेतरहाट समुद्रतल से 3622 फीट की ऊंचाई पर है। हम जरा आगे बढ़े तो सड़क कि‍नारे बंदर नजर आए, जैसा कि‍ हर पहाड़ी स्‍थल पर दि‍खता है।


हम चक्‍कर खाते ऊपर की ओर जा रहे थे। सड़क के दोनों तरफ बांस का जंगल था। हमने पहली बार बांस का जंगल देखा। अब जाकर नेतरहाट के नाम का अर्थ भी समझ आया। नेतरहाट नाम इस लि‍ए पड़ा कि‍ नेतुर का अर्थ (बांस) होता है और हातु यानि‍ (हाट)। इन दोनों को मि‍लाकर बना नेतरहाट। बहरहाल हम बांस के जंगल के बीच से गुजर रहे थे। बीच-बीच में कचनार के पेड़ भी नजर आ रहे थे। कचनार के फूल बेहद खूबसूरत होते हैं। यहां आदि‍वासी जनजीवन में कचनार के कोमल पत्‍ति‍यों का साग खाया जाता है। बहुत स्‍वादि‍ष्‍ट होता है यह साग। और फूलों की सुंदरता से तो सभी परि‍चि‍त ही हैं।

हम जंगल की सुंदरता नि‍हारते हुए आगे चलते गए। मन में डर भी था कि‍ कहीं सूर्यास्‍त रास्‍ते में ही न हो जाए। बीच जंगल में जाने की इच्‍छा होते हुए भी समय का ख्‍याल रखते हुए हम नहीं रूके। अब जंगल का दृश्‍य बदलने लगा था। बांस का जंगल साल के ऊंचे लंबे पेड़ और चीड़ के दरख्‍तों के जंगल में बदल चुका था। हम खुशी और आश्‍चर्य से चीख ही पड़े....हमारे झारखंड में चीड़ के जंगल..हमें आजतक पता ही नहीं। दि‍या तले अंधेरा इसीलि‍ए कहा जाता है। यहां ऊंचे यूकोलि‍प्‍टस के पेड़ भी हमारा स्‍वागत कर रहे थे।


हम मुग्‍ध भाव से आसपास देखते आगे बढ़ चले। शाम 5 बजे हम नेतरहाट में थे। पूछने पर पता लगा कि‍ सनसेट प्‍वांट यहां से करीब दस कि‍लोमीटर की दूरी पर है। अब वक्‍त नहीं था कुछ देखने-सुनने का। हम सीधे पहुंचे सूर्य डूबने का नजारा देखने। रास्‍ते में एक खूबसूरत बड़ा सा तालाब दि‍खा, जो कि‍सी झील की तरह लग रहा था। 

जब हम सनसेट प्‍वांइट पहुंचे तो सूर्य अस्‍तचलगामी था। एक बछड़ा अपनी मां का दूध पी रहा था। अवि‍ ने रूककर गौर से देखा। तस्‍वीर भी ली। आगे बढ़े तो लोगों की भीड़भाड़ थी। सरकार ने सौंर्दयीकरण करा दि‍या है। बैठने के लि‍ए शेड की व्‍यवस्‍था है तो ऊपर से नजारा देखने का जगह भी। मतलब ऐसी जगह जहां शाम प्राकृति‍क नजारे देखकर बि‍ता सके। 


हम जैसे ही बढ़े..सड़क पर भूरे रंग के फूल बि‍छे थे। जैसे हमारा स्‍वागत कर रहे हो। ऊपर नजरें उठाकर देखा तो साल के पेड़ फूलों से लदे थे। ऊपर नीले आकाश में आधा चांद दमक रहा था। पश्‍चि‍म में आकाश पीला था। दो तीन पहाड़ि‍यां नजर आ रही थी। मुझे डलहौजी की पहाड़ि‍यां याद आई। ऐसा ही खूबसूरत लगता था वहां भी। नेतरहाट पठार के नि‍कट की पहाड़ि‍यां सात पाट कहलाती हैं। आंखों को ऐसा आभास हुआ कि‍ सातों पहाड़ दि‍ख रहे हैं सूरज की पाली रौशनी में चमकते हुए। 



सखुआ के जंगल के बीच है यह स्‍थल। आसपास की मि‍ट्टी का रंग लाल था और बैरि‍केटि‍ंग के बाद एक सुंदर स्‍त्री-पुरुष की प्रति‍मा भी थी। लड़की के हाथ में बास्‍केट और लड़के के हाथ में बांसुरी। स्‍वभावि‍क है जि‍ज्ञासा ठाठें मारने लगी मेरे दि‍माग में कि‍ प्रति‍मा क्‍यों बनाई गई यहां। 

पता चला,  लड़की का नाम मैग्‍नोलि‍या  था।  मैग्‍नोलि‍या एक अंग्रेज अधि‍कारी की बेटी थी। गांव में एक चरवाहा रहता था। वह प्रति‍दि‍न अपने मवेशि‍यों को लेकर जंगल में एक स्‍थान पर जाता, जहां से खूबसूरत आसमान से देखते-देखते घाटि‍यों में छुपता था सूरज। वह बहुत मधुर बांसुरी बजाता था।  मैग्‍नोलि‍या को इसी आदि‍वासी चरवाहे से प्‍यार हो गया। वह रोज चरवाहे की बांसुरी सुनने के लि‍ए वहां जाती। 

जब अंग्रेज 
अधि‍कारी को इसका पता लगा तो बहुत नाराज हुआ। उसने चरवाहे को समझाने की कोशि‍श की। जब नहीं माना तो उसने चरवाहे को मरवा दि‍या। मैग्‍नोलि‍या को जब इसका पता लगा तब वि‍रह से व्‍याकुल होकर इसी स्‍थान पर आई और अपने घोड़े सहि‍त यहां से नीचे घाटी में कूद कर अपने जीवन काे समाप्‍त कर लि‍या। उसी की याद में बना है यह सनसेट प्‍वांइट जि‍से नाम दि‍या गया मैग्‍नोलि‍या प्‍वांइट। आज भी वह पत्‍थर मौजूद है जि‍स पर बैठकर वो चरवाहा बांसुरी बजाया करता था।   जाने कथा सच्‍ची है या गढ़ी हुई, मगर लोगों को आकर्षि‍त करती है। 



अब लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। कुछ लोग हमारी तरह कैमरा हाथ में पकड़े पश्‍चि‍म की ओर टकटकी बांधे बैठे थे। धूप से पत्‍ति‍यां चमक रही थी। सखुआ के फूल जमीन पर थे और खुश्‍बू हवाओं में । परि‍सर में एक चाय की दुकान थी। वहां लोगों की भीड़ लगी हुई थी। गरमागरम पकौडि‍यां नि‍कल रही थी। लोग चाय-पकौड़ी के साथ शाम का आनंद ले रहे थे। सूखे पेड़ के ठीक बगल में सूर्यास्‍त का नजारा सबसे सुंदर लगेगा, इस अहसास के साथ मैं वहीं खड़ी रही।

क्रमश: 

Wednesday, May 31, 2017

मन है कोर्टरूम


मेरा मन
कभ्‍ाी-कभ्‍ाी बन जाता है हाईकोर्ट
आसपास की समस्‍या
दि‍ल के अलग-अलग खानों में
रखा हुआ दर्द
चीत्‍कार उठता है
तो
स्‍वत: संज्ञान लेता है मन
आदेश देता है दि‍माग को
कि‍
दि‍ल के उस कोने में
अति‍क्रमण है
त्‍वरि‍त कार्रवाई कर
स्‍थि‍ति‍ नि‍यंत्रण में लाई जाए
यदि‍
होता रहे ऐसा ही दुरूपयोग
तो क्‍यों न दि‍ल का
वह खाना बंद करा दि‍ए जाए।

मेरा मन
कभ्‍ाी-कभ्‍ाी
सुप्रीम कोर्ट में तब्‍दील हो जाता है
कि‍‍‍‍सी मसले पर
पुरजोर बहस
चलाता है
दि‍ल और दि‍‍‍‍‍माग
झनझना जाए
इतनी कठोर बातें भी कहता है

महीनों तक चलती है बहस
फि‍र
होती है सुनवाई
दि‍ल, दि‍माग, आत्‍मा और
जरूरतेंं
सभी पक्ष रखते हैैं अपना
कोर्ट सुनता है हर बात
मगर
फैसला सुरक्षि‍त रख लेता है
आशाओं-नि‍राशाओं को अधर में रख
सारी कार्रवाई से आए फैसले
को सीलबंद कर
लंबी छुट्टी में चला जाता है
कोर्ट रूपी मन

फैसले की आस में
बीमार दि‍‍ल
अखबार की हेडलाइंस की तरह
अपनी
धड़कनें पढ़ता है
और सारी
न्‍यायि‍क प्रक्रि‍या को खूब गाली बकता है

इस देस में
कछुए की चाल से
होता है कोई भी फैसला
और मेरा मन
इस देस का सच्‍च्‍ाा नागरि‍क है
आदेश खूब देता है, सुर्खि‍यां बटोरता है
मगर
कि‍‍‍‍‍तना हो रहा अनुपालन
यह कहां देख पाता है
जो था, जैसा था, सब वैसा ही रह जाता है ।

रौशनी.....

वो इस क़दर मुझमें उतर गया 
दि‍ल बना एक कमरा
और वो रौशनी सा भर गया 


तस्‍वीर...भीमताल की 

Monday, May 29, 2017

मन का आइना

मि‍लन की तीसरी कि‍स्‍त


.... अब हम दोनों खूब जोर से हंस पड़े। अपनी कल्‍पना की उड़ान पर तुम मुग्‍ध दि‍खे और मैं तुम पर। हंसी थमने पर वेटर को बुलाकर तुमने कुछ स्‍नैक्‍स का आर्डर दि‍या और अपने बगल से एक पैकेट उठाकर मेरी ओर बढ़ाया। वह एक खूबसूरत रैपर से लि‍पटा गि‍फ्ट पैक था। मैं खोलने लगी तो रोक दि‍या तुमने। कहा - ''बाद में खोल लेना''। मैंने कहा...'' मैं तो तुम्‍हारे लि‍ए कुछ ला नहीं पाई। सब कुछ अनि‍श्‍चि‍त सा था''।

तुमने कहा.. ''मुझे कुछ चाहि‍ए भी नहीं तुमसे। बस एक चीज दे दो...जो मैंने कहा था लाने''। मैं असमंजस से देखने लगी उसका चेहरा। वो बोला....''अरे...वो धागा रखने बोला था न मैंने ...मन्‍नतों वाला धागा जो तुमने मेरे लि‍ए बांधा था एक टुकड़ा अपने ईष्‍ट देव के मंदि‍र में और आधा बचाकर रखा था मेरे लि‍ए। वो दे दो। उससे कीमती चीज मेरे लि‍ए कुछ भी नहीं''।

मुझे याद आया एक बार तुम बहुत बीमार पड़े थे। उन दि‍नों मैं केदारनाथ दर्शन को गई थी। तुम्‍हारा फोन आया। मैं डर गई थी तुम्‍हारी कमजोर आवाज सुनकर। मैंने कहा था...''मत चि‍ंता करो। शि‍व सब ठीक कर देंगे''। और मैंने कुछ नहीं मांगा था शि‍व से....सि‍र्फ तुम्‍हारे लि‍ए प्रार्थना की थी। तुम्‍हारे स्‍वस्‍थ होने की। याद है मुझे तब वहां मेरा मन नहीं लगा था। सारा वक्‍त तुम्‍हें सोचने में नि‍कल गया। मगर मेरे लौटने तक तुम ठीक हो गए थे एकदम। तभी कहा था तुमने...''वो धागा संभाल कर रखना। हम जब भी मि‍लें....मुझे देना''। मैंने उसी वक्‍त अपने पर्स में रख लि‍या था। यह संयोग था कि‍ इस सफ़र में वही पर्स था मेरे साथ।

मैंने धागा नि‍कालकर तुम्‍हारी ओर बढ़ाया। तुमने अपनी कलाई मेरी तरफ बढ़ा दी और चुपचाप मुझे देखने लगे। मैंने वो लाल-पीला धागा तुम्‍हारी कलाइयों पर बांध दि‍या। तुमने उसे बहुत श्रद्धा से अपनी ऑंखों से लगाया और बोला....''हमेशा पहनूंगा इसे। शि‍व का आर्शीवाद और तुम्‍हारी याद बनाकर संजोए रखूंगा हरदम''।

मैंने देखा...तुम्‍हारा चेहरा कोमल हो आया था। जैसे कुछ पि‍घल रहा हो अंदर और उसे संभालने की कोशि‍श कर रहे थे। मैंने बात बदली। '' फोटो में तो बहुत स्‍मार्ट लगते थे। अलग-अलग स्‍टाइल से हजारों तस्‍वीरें। सामने से तो बि‍ल्‍कुल बंदर की तरह लगते हो''।

तुम्‍हारा मुंह बना.....''अच्‍‍‍‍छा ...बंदर की तरह लगता हूूं....और तुम..और तुम....''

मुझे लगा अब मेरी खि‍ंचाई शुरू होगी। मैं वार झेलने को तैयार थी.....तुमने कहा....''तुम...जैसी तस्‍वीरों में दि‍खती हो...उससे बहुत ज्‍यादा खूबसूरत हो।..बि‍ल्‍कुल मासूम, बच्‍चे की तरह नि‍श्‍छल है तुम्‍हारा चेहरा.... तुम्‍हारी नि‍र्दोष आंखें ....''

उफ.....अब कभी कि‍सी बात पर तुमसे झगड़ भी नहीं पाऊंगा कभी....तुम्‍हारा दि‍ल नहीं दुखा सकता कभी...ईश्‍वर पाप देगा मुझे.....

मैं चकि‍त होकर उसका चेहरा देख रही थी......उसके बाल हवा से उड़ रहे थे....होठों पर बहुत मीठी मुस्‍कान थी....और ऑंखे......आइना...मन का

Thursday, May 25, 2017

तुझसे है पहले का नाता कोई ....


मि‍लन की दूसरी कि‍स्‍त
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नि‍गाहें मि‍लीं ...वो मेरी तरफ़ मुस्‍कराता हुआ बढ़ा। कदमों की तेजी देखकर लगा कि‍ अभी गले लगा लेगा मुझको। मगर नहीं....पास आकर कदम थमे उसके। उसने हाथ भी नहीं मि‍लाया। बस एक आत्‍मीय पहचान उभरी और उसने मेरे हाथों से बैग ले लि‍या। कहा...''पहले बाहर नि‍कलो यहां से''। 

मैं मंत्रमुग्‍ध सी उसके पीछे चलने लगी। कभ्‍ाी कदम साथ होते कभी जरा सा आगे-पीछे। बाहर आकर उसने आवाज दी......टैक्‍सी


मैं ठीक उसके बगल में खड़ी होकर ''टैक्‍सी'' की ओर देखने लगी। समझ नहीं आ रहा था कि‍ अब हम कहां
 जाएंगे। तभी अचानक उसने मुड़कर बहुत धीरे से कहा...''गार्जियस''......मैं एकदम से सुन नहीं पाई । पूछा - कुछ कहा क्‍या ?....उसने होंठों के साथ-साथ आंखों से मुस्‍कराते हुए कहा...''बहुत सुंदर हो तुम, 
बहुत प्‍यारी भी। मेरे अनुमान से कहीं बहुत ज्‍यादा''। 

मैं बि‍ल्‍कुल झेंप सी गई। तब तक टैक्‍सी आ गई थी। हम दोनों उसमें बैठ कर एक रेस्‍तरां पहुंचे। हमारे पास कोई 
और जगह नहीं थी जहां बैठकर बातें करते। मेरे पास केवल दो घंटे का वक्‍त था। फि‍र मुझे दूसरी ट्रेन
पकड़कर अमृतसर जाना था, जहां जाने के लि‍ए मैं अपने घर से नि‍कली थी कि‍ मेरा इंटरव्‍यू है वहां। बीच में ये शहर रोक लेगा मुझको, ये नहीं जानती थी। पीले अमलतास वाला शहर.... 

खैर..अब हम रेस्‍तरां के अंदर थे। ठीक आमने-सामने। 
एक दूसरे को देखते हुए झेंप रहे थे। बात कहां से शुरू करूं...कुछ समझ नहीं आ रहा था। शायद वो भी मेरी तरह अंदर ही अंदर घबराया हुआ था। हम एक दूसरे को देखने के बजाय आसपास के लोगों को ज्‍यादा देख रहे थे। बगल में दो लड़कि‍यां बि‍ंदास तरीके से बैठकर बातें कर रही थी। उसकी नजरें बार-बार उस तरफ़ जाता देख मैंने पूछा.....''बहुत अच्‍छी लग रही हैं क्‍या ये लड़कि‍यां तुम्‍हें''। एकदम घबरा से गए तुम। ''अरे नहीं.....बस यूं ही नज़र चली जा रही थी''। 

अब हम कॉफी के सि‍प के साथ बात शुरू करने का सि‍रा तलाश रहे थे। मैंने ही कहा...''आखि‍रकार हम मि‍ल ही गए...पहली बार''। उसने तुरंत जवाब दि‍या............''ना....याद करो हम पहले भी मि‍ले हैं एक बार''...मैं आश्‍चर्यचकि‍त होकर उसका चेहरा देखने लगी। ''मुझे तो याद नहीं''...कहा मैंने। 

उसने मुस्‍कराते हुए कहा....  ''याद करो..उस 
दि‍न तुम्‍हारे बाल खुले थे। तुम जंगल में कि‍सी फूल की तलाश में नि‍कली थी। मैं उधर से गुजर रहा था। पूछा तुमसे....क्‍या ढूंढ रही हैं आप। तुमने कहा था..घेटू के फूल ढूंढ रही हूं मैं। बड़ी अच्‍छी खुश्‍बू होती है। जंगली फूल है वो। चहकती हुई कहने लगी तुम....मुझे कर्णफूल भी बहुत पसंद हैं। कहीं दि‍खे तो बताना। मैं बहुत दूर नि‍कल गया और तुम्‍हारे लि‍ए कर्णफूल तलाश के लाया। तुमने पहना उसे। बहुत खूबसूरत लग रही थी फूलों का श्रृगांर कर के तुम''। 

मैं मंत्रमुग्‍ध होकर तुम्‍हारी या कहो अपनी कहानी सुन रही थी। तुम ऐसी तन्‍मयता से सुना रहे थे कि‍ लग रहा था सब सच है। ''फि‍र आगे''....मैंने पूछा....

बोले तुम...''अगले दि‍न फि‍र उसी जंगल में हम मि‍ले। अब मैंने पूछा तुमसे कि‍ - तुम कौन हो सुंदरी...अपने पि‍ता का नाम तो बोलो। और ये जो मेरे लाए फूलों का श्रृगांर करती हो....बदले में क्‍या दोगी।
तुम 
शरमा कर पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी। उस वक्‍त तुम्‍हारे बालों में घेटू का फूल महमहा रहा था। और गोरे गाल इतने आरक्‍त थे अंतर करना मुश्‍कि‍ल था कि‍ गाल ज्‍यादा लाल हैं या तुम्‍हारे कानों का कर्णफूल''। 


अब तुम डूबे थे। जैसे हम कि‍सी रेस्‍तरां में नहीं घने जंगल में हैं जहो हमारे अलावा कोई और नहीं।

''मुझे याद है देवयानी...उस दि‍न तुमने काले रंग की एक कंचुकी पहनी थी। तुम्‍हारा उत्‍तरीय  गहरे हरे रंग का था और घुटने तक लांग पहनी थी लाल रंग की...मराठी लड़कि‍यों की तरह....

मैंने 
रोका उसे...''सुनो....ये कब की बात है.....और मेरा नाम देवयानी तो नहीं....ये क्‍या कह रहे तुम'' ? तुमने एक गहरी नजर मुझ पर डाली....डूबी सी आवाज में बोले...''ये अतीत है हमारा देवयानी....तेरा-मेरा..हमारा''.....

'' पि‍छले जन्‍‍‍म  की बात है.....तुम्‍हें क्‍‍‍‍या याद नहींं ''?  


तस्‍वीर- घेटू के फूल

क्रमश: 

Sunday, May 21, 2017

आए हैं तुझसे मि‍लने की हसरत लि‍ए....



मि‍लन की पहली कि‍स्‍त
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सारा दि‍न दि‍ल धकधक करता रहा, जैसे सीने पर ही ट्रेन चल रही हो कोई। 24 घंटे का सफ़र 24 बरस का हो गया हो जैसे।कई ख्‍याल, कई कल्‍पनाएं और ढेर सारा डर....

आाखि‍र पहली बार तो मि‍ल रही थी उससे। बस मंजि‍ल पर पहुंचने को थी। बेसब्री मेरे चेहरे से झलक रही थी जैसे। आसपास के लोग बड़े गौर से चेहरा देख रहे थे मेरा। मैं बेचैनी में बार-बार दरवाजे तक जाती और लौट आती। बंद दरवाजे के शीशे के बाहर पेड़ रफ्तार पकड़ के दौड़ रहे थे। जैसे उन्‍हें मुझसे भी ज्‍यादा जल्‍दी है कहीं पहुंचने की।

अमलतास पूरे शबाब में था। झूमते, गर्मी के अहसास को दरकि‍नार करते। हां, वो अमलतास वाला शहर ही था, जहां मुझे मि‍लता वो। जब पहली बार दि‍ल में दस्‍तक हुई थी तब यही अमलतास साक्षी था। तब बहुत उदास लगा था मुझे, पर आज नहीं। मि‍लन के रंग से खि‍ला-खि‍ला था और भी।

ट्रेन की रफ़्तार कम हुई मगर दि‍ल की धड़कन बढ़ गई। ट्रेन रूकने से पहले ही गेट पर खड़ी हो गई। कि‍सी की नजर मुझे ढूंढ तो नहीं रही......कोई चेहरा जो जाना-पहचाना सा हो। पहली बार मि‍लूंगी उससे। देखूंगी उसको। जो तस्‍वीर देखी थी जाने उससे मि‍लती है शक्‍ल या नहीं।

नि‍:संदेह ये परीक्षा की घड़ी थी। आंखों में 'सि‍र्फ तुम' फि‍ल्‍म का मंजर याद आ गया। एक दूसरे के करीब से वो लोग जैसे नि‍कल गए वैसे कहीं हम भी.......पता नहीं पहचान पाऊंगी या नहीं।

ट्रेन रूकते न रूकते अपना एयरबैग थाम धप्‍प से जमीन पर। अब इंतजार नहीं होता। मुझे उसे देखना है जि‍सके लि‍ए मैं पागल हूं। जि‍सकी खाति‍र सब भूलकर मैं मि‍लने चली आई हूं।

तभी वो दि‍खा.....पीठ पर लैपटाॅप बैग लटकाए..मेरी फेवरेट सफ़ेद शर्ट और ब्‍लू जींस में। वो खड़ा था बुक स्‍टॉल के ठीक बगल में, पीलर के पीछे। मैेने देखा..उसके गालों में कंपन थी। जाने तेजी से दौड़कर आने के कारण या मि‍लने की घबराहट से......

वही था...बि‍ल्‍कुल वही....

क्रमश: 

Tuesday, May 16, 2017

अज़ब सा है जादू


अज़ब सा है जादू,जो मुझपे है छाया
तुम्हे सोच के दिल मेरा मुस्कराया
मेरे अश्क कहते हैं मेरी कहानी
के संगदिल सनम को निभाना न आया
खिलौना समझके मेरे दिल से खेला
भरा जी जो उसका मुझे छोड़ आया
के फ़ितरत में उसकी वफ़ा ही नही थी
तभी साथ उसने न मेरा निभाया
फिरा हर गली में,वो बनके दीवाना
हुआ क्या है रश्मि,समझ में न आया